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विकास

एक तरफ चंपत, दूसरी तरफ आशीष... आखिर कौन किससे बीस?

👤 Ramkrishna Yadav | 📅 10 Jul 2026, 09:11 AM | 👁️ 87 Views | 📍 उत्तर प्रदेश , Azamgarh , सगड़ी

अयोध्या से आजमगढ़ तक पारदर्शिता पर उठे सवाल, भैरव धाम मामले में सूचना न देने पर EO पर 25 हजार का जुर्माना

आजमगढ़। अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावे और उसके प्रबंधन को लेकर मचे सियासी एवं सामाजिक घमासान के बीच अब आजमगढ़ का बाबा भैरव धाम भी सुर्खियों में है। दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन एक समान सवाल दोनों जगह गूंज रहा है आखिर सार्वजनिक आस्था और उससे जुड़े संसाधनों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही कब सुनिश्चित होगी?

आजमगढ़ के नगर पंचायत महराजगंज स्थित बाबा भैरव धाम में कराए गए सुंदरीकरण एवं विकास कार्यों का विवरण सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मांगा गया था। आरोप है कि कई बार आवेदन दिए जाने और उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के स्पष्ट आदेशों के बावजूद संबंधित सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई।

इस गंभीर लापरवाही पर उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग ने कड़ा रुख अपनाते हुए नगर पंचायत महराजगंज के जन सूचना अधिकारी एवं अधिशासी अधिकारी आशीष राय पर 25 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया है। आयोग ने अर्थदंड की वसूली तक उनका वेतन अवरुद्ध रखने का भी निर्देश दिया है।

आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद न तो सूचना उपलब्ध कराई गई और न ही अधिकारी आयोग के समक्ष उपस्थित होकर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण दे सके। आयोग ने अंतिम अवसर देते हुए अगली सुनवाई में स्वयं उपस्थित होने और मांगी गई सूचना उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।

इधर, अयोध्या में श्रीराम मंदिर के चढ़ावे को लेकर उठे विवाद ने पहले ही देशभर में पारदर्शिता की बहस को तेज कर रखा है। ऐसे माहौल में आजमगढ़ का यह मामला भी चर्चा का केंद्र बन गया है। सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय जनचर्चाओं तक एक तंज खूब सुनाई दे रहा है—"एक तरफ चंपत, दूसरी तरफ आशीष... आखिर कौन किससे बीस?"

हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अयोध्या और आजमगढ़ के दोनों मामले अलग-अलग प्रकृति के हैं तथा दोनों की कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाएं स्वतंत्र रूप से चल रही हैं। किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष समानता स्थापित नहीं की जा सकती। फिर भी इतना तय है कि इन घटनाओं ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि धार्मिक स्थलों से जुड़े विकास कार्य, सार्वजनिक धन और सरकारी जवाबदेही के मामलों में अब जनता केवल दावे नहीं, बल्कि दस्तावेजी पारदर्शिता चाहती है। सूचना छिपाने की प्रवृत्ति पर सवाल पहले से कहीं अधिक मुखर हो चुके हैं।

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