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14 Feb 2026, 07:48
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सहारनपुर: 'पैर पर कपड़ा रखा और ठायं-ठायं!' देवबंद जेल के वायरल वीडियो ने 'ऑपरेशन लंगड़ा' की खोली पोल
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Admin
रिपोर्टर, द पब्लिक एक्सप्रेस
सहारनपुर के देवबंद जेल से वायरल हुए इस वीडियो में न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने बंदियों ने पुलिस एनकाउंटर का खौफनाक सच बताया है। जानें कैसे 'ऑपरेशन लंगड़ा' के नाम पर लिखी जा रही है पटकथा।
सहारनपुर। उत्तर प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ जारी पुलिस की कार्रवाई 'ऑपरेशन लंगड़ा' एक बार फिर बड़े विवादों के घेरे में है। सोशल मीडिया पर बिजली की तरह वायरल हो रहे एक वीडियो ने यूपी पुलिस की मुठभेड़ों की पटकथा और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह वीडियो देवबंद उप-कारागार (सहारनपुर) का बताया जा रहा है, जिसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूछताछ के दौरान बंदियों ने एनकाउंटर का 'असली' सच बयां किया है।
मजिस्ट्रेट के सामने बंदियों ने खोला 'एनकाउंटर' का राज
करीब डेढ़ मिनट के इस वीडियो में न्यायिक मजिस्ट्रेट परविन्द्र सिंह जेल के औचक निरीक्षण के दौरान उन बंदियों से पूछताछ करते नजर आ रहे हैं, जिन्हें पुलिस ने मुठभेड़ में घायल दिखाकर जेल भेजा था। वीडियो में एक बंदी ने मजिस्ट्रेट को बताया:
"साहब, मुझे रास्ते से उठाया गया और पुलिस चौकी ले जाकर थर्ड डिग्री दी गई। जब मैंने जुर्म नहीं कबूला, तो मुझे जंगल ले जाकर पैर पर कपड़ा रखा और बिल्कुल नजदीक से गोली मार दी गई।"
बंदी ने यह भी दावा किया कि पुलिस ने बाद में एक अवैध कट्टे से फायरिंग दिखाकर फर्जी मुठभेड़ का नाटक रचा।
करंट लगाया और रची गई मुठभेड़ की कहानी
वीडियो में एक अन्य बंदी ने भी अपने पैर पर गोली के निशान दिखाते हुए लगभग यही आपबीती सुनाई। उसने आरोप लगाया कि उसे हिरासत में लेकर पहले बिजली के झटके दिए गए और फिर मुठभेड़ का रूप देने के लिए पैर में गोली मारी गई। बंदियों के इन बयानों ने यूपी पुलिस की उस 'रील वाली वीरता' पर सवाल उठा दिए हैं, जिसमें अक्सर बदमाशों को घुटने के नीचे गोली लगी पट्टी के साथ दो सिपाहियों का सहारा लेकर चलते हुए दिखाया जाता है।
पुलिस महकमे में हड़कंप, पर चुप्पी बरकरार
इस सनसनीखेज वीडियो के सामने आने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। हालांकि, पुलिस सूत्रों का कहना है कि यह मामला करीब दो माह पुराना है, लेकिन अभी तक किसी भी अधिकारी ने आधिकारिक तौर पर इस वीडियो की पुष्टि या खंडन नहीं किया है। वायरल वीडियो ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या न्याय अब सड़कों और जंगलों में गोलियों से तय होगा या अदालत की दहलीज पर?
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